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Tokyo Olympic : Tokyo Olympic : 41 साल बाद फिर से चमक उठी भारतीय हॉकी, 1980 में मॉस्‍को में ऐसे जीता था सुनहरा तमगा

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यह ओलिंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम का आखिरी पदक साबित हुआ. 1980 के बाद भारत ने अपना पहला ओलिंपिक पदक जीता है. इस जीत ने एक बार फिर से भारतीय हॉकी के पुराने दिनों को ताजा कर दिया है.

टोक्यो ओलिंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम (Indian Hockey team) ने इतिहास रच दिया है. 41 साल बाद भारत ने ओलिंपिक मेडल अपने नाम किया है. कांस्य पदक के मुकाबले में भारतीय टीम ने जर्मनी को 5-4 से मात देकर दुनिया के बता दिया की भारत की हॉकी में अभी वो दम है, जो किसी को भी चित कर दे. 1980 के बाद टोक्यो ओलिंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने पहला पदक जीत पिछले चार दशकों से जारी मेडल के सूखे को खत्म कर दिया है. इस जीत ने एक बार फिर से भारतीय हॉकी ने अपने पुराने दिनों को ताजा कर दिया है, तो चलिए आपको लिए चलते हैं 41 साल पहले जब, भारतीय हॉकी टीम ने पदक जीता था.

1964 ओलिंपिक में स्वर्ण जीतने के बाद भारत ने अगले दो ओलिंपिक- 1968 और 1972 में कांस्य पदक जीते थे. लेकिन 1976 में तो वो हुआ जिसकी कल्पना तक उस समय किसी ने नहीं की होगी. भारत 1976 ओलिंपिक में पदक नहीं जीत पाया था और यह पहली बार था कि भारत के हिस्से हॉकी में ओलिंपिक पदक नहीं आया हो. 1980 में भारत ने हालंकि इसकी भरपाई कर दी.

यह कहना गलत नहीं होगा कि मॉस्‍को ओलिंपिक-1980 में भारत की जीत का एक बड़ा कारण कई देशों का खेलों में हिस्सा न लेना भी था. इन ओलिंपिक खेलों में सिर्फ छह टीमें उतरी थीं. इसमें 1976 ओलिंपिक की स्वर्ण पदक विजेता न्यूजीलैंड, रजत पदक विजेता ऑस्ट्रेलिया और कांस्य पदक विजेता भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान भी शामिल नहीं थे. इन सभी के अलावा यूरोप की बड़ी टीमें जैसे जर्मनी, नीदरलैंड्स और ग्रेट ब्रिटेन ने भी इन खेलों में हिस्सा नहीं लिया था. इन सभी देशों ने अमेरिका के नेतृत्व में खेलों का बहिष्कार करने का फैसला किया था जिसका कारण सोवियत संघ का अफगानिस्तान में दखल था.

युवा टीम पर दारोमदार

1976 ओलिंपिक में भारत ने उस समय तक का अपना सबसे बुरा प्रदर्शन किया था. इसलिए टीम की कोशिश थी कि वह मॉस्‍को में इसकी भरपाई भी करे. उसके पास मौका भी था क्योंकि कई बड़े देश नहीं खेल रहे थे. भारत ने वासुदेवन भास्करन के नेतृत्व में युवा टीम उतारी थी जिसके पास प्रतिभा की कमी नहीं थी. भास्करन और बीर बहादुर छेत्री को छोड़कर बाकी टीम के खिलाड़ी अपना पहला ओलिंपिक खेल रहे थी. पहले ही मैच में उसने तंजानिया को 18-0 के विशाल अंतर से हरा दिया. इस मैच में सुरिंदर सोढ़ी ने पांच गोल किए. देविंदर सिंह ने चार, भास्करन ने चार, जफर इकबाल ने दो गोल किए, मोहम्मद शाहिद, मार्विन फर्नांडेज और कौशिक ने भी एक-एक गोल किए थे.

लगातार दो ड्रॉ

जीत के साथ शुरुआत करने वाली भारतीय टीम फिर लय भटक गई या यू कहें कि उसका सामना दो मजबूत टीमों से हुआ. अगले मैच में पोलैंड के साथ भारत ने 2-2 से ड्रॉ खेला और फिर स्पेन के साथ भी मुकाबला 2-2 से बराबरी पर रहा. पोलैंड के खिलाफ देविंदर सिंह और मार्विन ने एक-एक गोल किए जबकि स्पेन के खिलाफ सुरिंदर ने दो गोल दागे.

क्यूबा, रूस को दी मात

दो मजबूत टीमों के खिलाफ भारत हालांकि हार को टालने में तो सफल रहा था. अगले दो मैच में उसने जीत हासिल करते हुए फाइनल में जगह बनाई. भारत ने पहले क्यूबा को 13-0 से मात दी. इस मैच में सुरिंदर ने चार, शाहिद ने दो, देविंदर, राजिंदर अमरजीत राणा ने दो-दो गोल किए. भास्करन ने एक गोल किया. भारत ने अगले मैच में मेजबान रूस को 4-2 से पटका. रूस के खिलाफ सुरिंदर ने दो गोल दागे. उनके अलावा सुरिंदर और शाहिद ने एक-एक गोल किया.

रोमांचक फाइनल में स्पेन को हराया

अब भारत के हिस्से पदक तो तय था लेकिन उसकी कोशिश स्वर्ण की थी जिसमें वो सफल भी रही. फाइनल में स्पेन से भारत का मुकाबला हुआ. मैच बेहद रोमांचक हुआ. भारत ने शुरू से मजबूत खेल दिखाया और दूसरे हाफ की शुरुआत तक तीन गोल की बढ़त ले ली. लेकिन यहां से रोमांच शुरू हुआ था. स्पेन ने फिर लगातार दो गोल कर भारत को परेशानी में डाल दिया. मैच में छह मिनट का समय बाकी था और मोहम्मद शाहिद ने भारत के लिए गोल कर दिया. दो मिनट बाद ही स्पेन के कप्तान जुआन अमत ने एक और गोल कर भारत को परेशानी में डाला लेकिन फिर आखिरी मिनटों में भारतीय डिफेंस ने स्पेन को बराबरी का गोल नहीं करने दिया और उसे 4-3 से हरा ओलिंपिक में अपना आठवां स्वर्ण पदक जीता.

1980 ओलिंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम

वासुदेवन भास्करन (कप्तान), बीर बहादुर छेत्री, एलन स्कोफील्ड, राजिंदर सिंह, देविंदर सिंह, स्वलवानुस डुंग, गुरमैल सिंह, रवींद्र पाल सिंह, एम.एम. सौम्या, चरणजीत कुमार, महाराज कृष्णा कौशिक, मार्विन फर्नांडेज, अमरजीत सिंह राणा, सुरिंदर सिंह सोढ़ी, मोहम्मद शाहिद, जफर इकबाल.

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