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धर्म

मानस मंत्र: भनिति मोरि सिव कृपां बिभाती, कपट हटाकर हित करने वाली होती है रामचरितमानस

Chaupai, ramcharitmanas: श्रीरामचरितमानस ग्रंथ की रचना तुलसीदास जी अनन्य भगवद्‌ भक्त के द्वारा की गई है. मानस मंत्र के अर्थ को समझते हुए मानस की कृपा से भवसागर पार करने की शक्ति प्राप्त करते हैं.

Motivational Quotes, Chaupai, ramcharitmanas : रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने सरस्वती जी और गंगा जी की वंदना करते हुए कहते है कि जैसे सरस्वती जी अज्ञान का नाश करती है और गंगा जी पापो को हरने वाली होती है. जैसे रात चंद्रमा, रोहिणी, बुध और संपूर्ण तारागण के उदय से शोभित होती है, वैसे मेरी कविता श्री शिव पार्वती जी की कृपा को पाकर शोभा को प्राप्त होगी. 

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता । 

जुगल पुनीत मनोहर चरिता ⁠।⁠। 

कहत सुनत एक हर अबिबेका ⁠।⁠। 

अब मैं सरस्वती जी और देव नदी गंगा जी की वन्दना करता हूँ. दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं. गंगा जी में स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी सरस्वती जी गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं. 

गुर पितु मातु महेस भवानी । 

प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ⁠।⁠। 

सेवक स्वामि सखा सिय पी के ।

हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ⁠।⁠। 

श्री महेश और पार्वती को मैं प्रणाम करता हूँ, जो मेरे गुरु और माता-पिता हैं, जो दीनबन्धु और नित्य दान करने वाले हैं,  श्री सीता पति रामचन्द्र जी के सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझ तुलसीदास का सब प्रकार से कपट रहित सच्चा हित करने वाले हैं.

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । 

साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ⁠।⁠। 

अनमिल आखर अरथ न जापू । 

प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ⁠।⁠। 

शिव-पार्वती जी ने कलियुग को देखकर, जगत के हित के लिये, शाबर मन्त्र समूह की रचना की, जिन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है, तथापि श्री शिवजी के प्रताप से जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है.

सो उमेस मोहि पर अनुकूला । 

करिहिं कथा मुद मंगल मूला ⁠।⁠। 

सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । 

बरनउँ रामचरित चित चाऊ ⁠।⁠। 

वे उमापति शिव जी मुझ पर प्रसन्न होकर श्री राम जी की इस कथा को आनन्द और मंगल की मूल उत्पन्न करने वाली बनायेंगे. इस प्रकार पार्वती जी और शिव जी दोनों का स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चाव भरे चित्त से श्री राम चरित्र का वर्णन करता हूँ.

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । 

ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ⁠।⁠। 

जे एहि कथहि सनेह समेता । 

कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ⁠।⁠। 

होइहहिं राम चरन अनुरागी । 

कलि मल रहित सुमंगल भागी ⁠।⁠। 

मेरी कविता श्री शिव जी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारा गणों के सहित चन्द्रमा के साथ रात्रि शोभित होती है. जो इस कथा को प्रेम सहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहें-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुन्दर कल्याण के भागी होकर श्री रामचन्द्र जी के चरणों के प्रेमी बन जायँगे. 

दोहा—

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ ⁠। 

तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ⁠।⁠।⁠

यदि मुझ पर श्री शिवजी और पार्वती जी की स्वप्नमें भी सचमुच प्रसन्नता हो, तो मैंने इस भाषा, कविता का जो प्रभाव कहा है, वह सब सच हो.

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